मेरा पहला पहला प्यार

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मेरा पहला पहला प्यार

 

भूले से भी ना भूल सकूँ एक ऐसी बात है वो

पहले प्यार का अंजाना सा कुछ मीठा सा एहसास है वो

 

पहली बार उसे मैने अपनी ही क्लास मे देखा था

सच कहूँ तब तक तो प्यार का मतलब भी नहीं पता था

रोज़ हम लड़ते थे

बेवजह झगड़ते थे

शायद मुश्किल ही हम प्यार से बात करते थे

 

वो ठीक मेरे आगे बैठता था

अंजाने मे ही सही, पर मेरा ध्यान उसी पर रहता था

जिस दिन वो स्कूल ना आए पूरा दिन बोरिंग होता

उस दिन मुझे समझ आया ये प्यार ऐसा ही है होता

 

वो रात मैं कभी नहीं भूलती

अगले दिन हमें जुदा होना था

स्कूल हो रहे थे खत्म

और कॉलेज जाना शुरू करना था

 

वो मेरे ही पड़ोस मे रहता था

और हर रोज़ बालकनी मे आकर मुझे चिढ़ाता था

मुझे याद है उस दिन पूरी रात बारिश हुई

और उस बारिश मे हमारी प्यार भरी दो बातें हुई

 

ये सिलसिला लगभग छः महीने चला

और उसके बाद वो लड़का मुझे कभी नहीं मिला

ये बात उसे भी थी पता

कि मेरा दिल उसी को है चाहता

 

हम दोनो अब स्कूल से निकल कॉलेज मे थे

अपनी अपनी ज़िंदगी मे मस्त थे

सोशियल मीडिया पे हम आज भी दोस्त हैं

पर अब हम सिर्फ़ “दोस्त” हैं

 

समय यूँही गुज़रता गया

और बचपन की यादों का सिलसिला पीछे छूटता गया

पर अचानक एक दिन वो मेरे सामने आ गया

एक लम्हे मे मुझे मेरा बीता हुआ समय याद आ गया

 

वो आकर मुझे बोला मैं आज भी उसी क्लास मे बैठना चाहता हूँ

एक बार फिर तुम्हारे संग लड़ना चाहता हूँ

आख़िरी दिन की पहली बारिश मे फिर से भीगना चाहता हूँ

जो तब से अब तक ना कहा वो कहना चाहता हूँ

 

तुझसे प्यार तो मुझे तभी हो गया था

और उसका एहसास तुझसे दूर होते ही हो गया था

आज वही सब तुझे कहने आया हूँ

मैं तेरा प्यार हूँ, तुझे प्यार करने आया हूँ

 

रिया शर्मा

और सब बदल गया

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और सब बदल गया

चन्द लम्हो ने मेरी ज़िंदगी बदल दी

इंसानियत की तरफ मेरी सोच बदल दी

आँखें शर्म से झुक गई

और नज़र अपनो मे अपनो को ढूँढने मे रह गई

 

उस गली मे मेरी दर्द भरी चीखे गूँजती रही

मगर खुद को इंसान कहने वालो की खिड़कियाँ बंद रही

घंटो मैं अकेली लड़ती रही

अकेली वीरानी सड़क पर पड़ी रही

पर किसी से एक कपड़ा नसीब ना हुआ

हे भगवान ऐसा किसी के साथ ना हो, क़ुबूल कर दुआ

 

हैवानियत का ऐसा गंदा रूप आज तक बस सुनती आई हूँ

आज मैं खुद इसका शिकार बन आई हूँ

काँप जाती है रूह इतना दर्द होता है

मौत से भी कई गुना बत्तर मंज़र होता है

एक तरफ खून की नदी बह चुकी थी

दूसरी ओर साँसे लगभग थम चुकी थी

 

माँ बाप के अलावा सब साथ छोड़ चुके थे

दोस्त रिश्तेदार सब पल भर मे पराए हो चुके थे पर मैं फिर खड़ी हूऊँगी

अपनी लड़ाई खुद लड़ूँगी

जीत ना सकी तो भी कोशिश ज़रूर करूँगी

मैं अपना अस्तित्व ऐसे नही खोने दूँगी

 

हज़ारो लड़किया इसका शिकार बनती हैं

किसी  के पल भर के “मज़े” के लिए कुचली जाती हैं

इन सब बातो का ज़िक्र पहले भी कई बार हुआ है

हक़ीकत जानते हुए भी इंसाफ़ क्यूँ अंधेरे मे खोया है

मैं आवाज़ बनूँगी उन सब की जो इस दर्द से गुज़रे हैं

और अगर हम अब भी कुछ ना कर सके ,

तो हम कुछ और नहीं बस ज़िंदा मुर्दे है

रिया शर्मा

 

बीत गए वो दिन

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बीत गए वो दिन

जब भी स्कूल के वो दिन याद करती हूँ
मन कहता है आज फिर बचपन लिख दे।
जब भी वो आख़री बेंच के क़िस्से कहती हूँ
मन कहता है आज फिर इस काग़ज़ पर वो फ़रियाद लिख दे।

वो दिन थे जब आज़ाद था यह मन
दोस्तों के बीच गुज़र गया बचपन।
ना कोई चिंता थी ना थे कोई ग़म
धोखा फ़रेब बदला कहाँ जाने थे हम।

होम्वर्क टाइम पर करना तो आदत ही नहीं थी
बिना डाँट के गुज़रे ऐसी कोई क्लास नहीं थीं।
कभी हाथ ऊपर करके खड़े रहते थे
कभी सर झुकाए घुटनो पर पड़े रहते थे।

रोज़ प्रार्थना में टीचर के ना आने की दुआ होती थी
हर आये नोटिस को देख छुट्टी की ख़्वाहिश होती थी।
टेस्ट तो जैसे युद्ध लगते थे
उस दिन दुश्मन सिर्फ़ टीचर बाक़ी सब भाई बनते थे।

बर्थ्डे वाले बच्चे के पास बैठना जैसे शान बढ़ा देता था
और उसके साथ हर क्लास में टॉफ़ी बाटना सम्मान दिला देता था।
बीच क्लास में टिफ़िन से खाने का मज़ा कुछ और था
सच में वो बचपन नहीं ख़ुशियों का दौर था।

आज जब भी मुड़ कर देखती हूँ
इस चेहरे पर मीठी सी हँसी को पाती हूँ।
ना जाने कहाँ आ गए हम
कहाँ खो गया वह मासूम बचपन।

बच्चे थे तब जल्दी से बड़ा होना चाहते थे
आज बड़े हो गए तो बचपन फिर से जीना चाहते है।
इस कश्मकश में ज़िंदगी पूरी बीत गई
वह भोली सी हँसी कहीं पीछे छूट गई।

उन दिनों हर दिन की शाम होती थी
गली मोहोल्लो में बच्चों की आवाज़ होती थी।
ज़िंदगी की दौड़ मैं हम इतना आगे आ गए
ऐसा लगता है हम ज़िंदगी जीना भूल गए।


रिया शर्मा

 

 

 

 

 

 

 

वक़्त

2016-14-6--10-48-06

वक़्त


वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं
यह किसी के लिए ठहरता नहीं
नासमझ है वो जो इसकी क़द्र करता नहीं
यह कभी भी एक जैसा रहता नहीं

वक़्त की आँधी कुछ पलो की होती है
इसकी ना शक्ल ना आवाज़ होती है
कहीं रिश्ते जुड़ते है
कहीं दिल टूटते है
कोई ज़िंदगी जीना सीख गया
कोई ज़िंदगी से ही हार गया
पर चलते सब है
लड़ते सब है
कोई हालात से कोई क़िस्मत से
कोई अपनो से कोई ग़ैरों से
कोई आज से परेशान है
कोई कल से अनजान है
पर बदलते वक़्त को देख
यहाँ हर कोई हैरान है

जीना है तो खुल के जी
ग़म ज़िन्दगी के हँस कर पी
क्यूँ आज कल में समय व्यर्थ करता है
याद रख ये वक़्त ज़रूर बदलता है


रिया शर्मा

आख़री ख़त

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आख़री ख़त

शायद यह मेरा आख़री ख़त हो
शायद फिर अब कभी मुलाक़ात ना हो
जा रहा हूँ भारत माँ को बचाने
एक बार फिर अपना फ़र्ज़ निभाने

माँ यह ख़त पढ़ कर आँसूँ ना बहाना
अपने बेटे पर नाज़ करके मुस्कुराना
देश के हर बेटे से यह कहना
तुम भी एक दिन सरहद पर ज़रूर जाना

पापा जब भी अपना बटुआ संभलोगे
मुझे तस्वीर के रूप में वहीं पाओगे
बचपन की तरह एक बार फिर तुम्हारे कंधे पर जाऊँगा
फ़र्क़ इतना होगा इस बार मैं घर नहीं आऊँगा

बहना अब तुझसे कोई लड़ाई नहीं करेगा
तेरा भाई अब कभी नहीं लौटेगा
तुझे अब कभी नहीं परेशान करूँगा
तारों के बीच रहकर तेरी सलामती की दुआ करूँगा

मेरे प्यार से कोई यह कह देना
हो सके तो मुझे माफ़ कर देना
सात वचन निभाने का वादा किया था
पर उन सब से पहले मैंने अपनी मातृभूमि को वचन दिया था

आज वो वचन निभाने का दिन है
सब पीछे छोड़ आगे बढ़ने का दिन है
अब मैंने यह ठान लिया है
या तो कुछ करना है या तो अब मरना है
हर हाल में मुझे अपना तिरंगा लहराना है।

  रिया शर्मा

तीन लफ़्ज़ काफ़ी है

2016-28-5--13-07-53

तीन लफ़्ज़ काफ़ी है

जब मेरी डोली दरवाज़े पर सज जाए
जब मेरे पापा की चिरेया अँगना छोड़ उड़ जाए
जब मेरी माँ के आँसू सारे बन्धन तोड़ बह जाए
जब तेरी बहन तुझे अपना मयका सौंप चली जाए
तब भैया सबको समझाकर यह कहना” मैं हूँ ना”

जब वो काँपते हाथ पानी का गिलास ना उठा सके
जब वो लड़खड़ाते पैर कपड़े सुखाने सीढ़ियाँ ना चढ़ सके
जब वो झुकी कमर तेरे साथ तेज़ ना चल सके
जब वो धुँधलाती नज़र खाने में पड़ा कंकर ना देख सके
तब भैया मेरी उस माँ से कहना” मैं हूँ ना”

जब वो झुके कंधे अपना सामान ख़ुद ना उठा सके
जब वो बूढ़ा शरीर बाहर जाकर दो पैसे ना कमा सके
जब वो जड़ो से हिलते दाँत बिना दाल रोटी ना चबा सके
जब वो पुरानी काया तेरी नई तकनीक ना सीख सके
तब भैया मेरे उन पापा से कहना” मैं हूँ ना”

और अगर तू ये सब ना कह सके तो ये याद रखना
ये वही माँ है जो तेरे लिए रात रात भर जागी है
ये वही पिता है जिसने तेरी पढ़ाई के लिए ना जाने किस किस के आगे झोली फैलाई है
ये वही माँ है जिसने कभी तुखे खिलाए बिना खाना नहीं खाया
ये वही पिता है जिसने हर त्योहार तुझे तोहफ़ा दिलाया
ये वही माँ है जो तेरे लिए संसार से लड़ी
ये वही पिता है जिसने तेरे ख़िलाफ़ उठी एक आवाज़ भी नहीं सही
दो वाक्यों में कहु तो
ये वो है जिनसे हम है
जिनके बिना तेरा मेरा वजूद ख़त्म है।
रिया शर्मा

Ek Bezubaan Ke Lafz

DogEk Bezubaan Ke Lafz

Main kuch kehta nai ye tum sochte ho

Mujhe kabhi dard hota nai aisa tum dekhte ho

Kabhi meri ankhon me doob ke dekhna

Kabhi mujhe apna maan kar dekhna

Insaniyat mann me jaga kar dekhna

Ek baar mere in lafzo pe gaur farmakar dekhna

Aj tu itna bada ho gaya

Is matlabi duniya me itna kho gaya

Ki tujhe ye bhi yaad nai

Hume banana wala ek hai, do nai

Jaise insaano ko dard hota hai

Hum bezubaaano ka bhi dil hota hai

Par tune mujhe humesha apne kaam k liye rakha

In sab k baad bhi maine tujhe sar ankhon pe rakha

Tu har baar mujhe aajmata raha

Main har baar tujhe apna khuda manta raha

Bhagwan ne tujhe bolne k liye jubaan di

Aj wo bhi sochta hoga kahi usne galati to nahi ki

Tujhse behtar to ye sadak hai

Dikhne me ye kadak hai

Par har roj ye mujhe alvida kehti hai

Aur mere sapne toot jane pe mujhse kehti hai

Tu kyu chupke ansoon bahata hai

Ye insaan hai… ye yuhi sabko rulata hai

Ria Sharma

Meri Ardass Tumse PAPA

Final Girl 1

Meri Ardaas Tumse PAPA

Papa kya kasoor tha mera

Main ek ladki hu isme kya dosh tha mera

Kyu main apki pari nahi ban saki

Kyu main apko kabhi khush nahi rakh saki

Maine wo sab kia jo main kar sakti thi

Fir bhi na jane kaha kya kami reh gai thi

Kyu meri kamiyabi bas ek din ki hoti hai

Aur har choti galati ki saja umra bhar ki hoti hai

Kyu bhaiya ko sab gale lagate hai

Aur mujhe har samay sar jhukana sikhate hai

Kyu main aangan ki dehleez laangh nahi pati

Main khelna chahti hu, par aisa kar nahi pati

Karodo k nahi mitti ke khilone maange the

Paiso se nahi apki jholi se sapne baandhe the

Par main har baar haar jati hu

Tumhare pass ane ki koshish me tumse aur dur ho jati hu

Maine tumhara sath maanga tha

Tumhare hi sath jeena chaha tha

Agar tumhe main itni hi napasand hu to keh do na papa

Mai kahi dur chali jaungi

Jahan se main tumhe kabhi nazar nahi aungi

Bs ek baar to mujhe gale laga lo

Ek baar to pyar se apni godi me sula lo

Ek baar to meri aur dekh muskura lo

PAPA ek baar to mujhe apna BETA bana lo.

Ria Sharma

Anjaan Sa Ek Darr

IMG_7144befunkyAj kuch ajeeb hua, kuch alag nai

1 nanhe jism ko bhook se ladte dekha, marte nahi

Aisa kuch humari zindagi me roj hota hai

Kahi na kahi is bimari se koi to rota hai

Par aj kyu dil me dard utha

Mera mann meri hasi se itna rootha

Shayad ye bhi meri tarah usi darr se dar gya

Jab ek chota bacche apni maa ke liye bheek maang maang kar mar gaya

Facebook whatsapp pe nahi, pathar pe apni maa ki tasveer lagai thi

Aur un massom ankhon ne har anjaan se ye umeed lagai thi

Ki shayad koi aj yahan rukega aur 2 rupay dega

Aur sham tak paise jod kar apni maa ka pet bharega

Wo bacha itna chotha tha ki koi use kaam bhi nai de raha tha

Maang kar khane k alawa use kuch upaye nazar nai aa raha tha

Par us din wahan koi nai ruka

Uski ma ka pet khali aur gala reh gaya sukha

Maa ko apne pet ki chinta nahi thi

Shayad aj use bhook bhi nahi thi

Andhera hote hi jab beta ghar aya

Use khali hath aur nirash dekh maa ka kaleja bhar aya

Maa ne muskura kar bola beta aj bhagwan ne kisi ko bheja

Uska naam nai pata par par uske sath bhar pet khana bheja

 

Maine apna pet bhar lia

Aur tere liye bhi kuch bacha lia

Ja dekh us bartan me kuch rakha hoga

Beta maaf kar dena but utna hi bacha hoga

Jab us bacche ne wo bartan dekha to usme kuch chawal k daane the

Shayad 2-3 roj purane the

Beta yahi soch kar khush ho gaya ki kum se kum maa ka to pet bhar gaya

Usne chup chap apna bichona lagaya aur wahi so gaya

Maa raat bhar roti rahi

Khud ko aur Ishwar ko kosti rahi

Boli ki kaise bebas maa hu jo apne bacche ka pet bhi na bhar sakti

Par hey Ishwar,

Tu mujhe kam se kam hath to deta, taki apne bete ka pet to bhar sakti

Us raat wo maa bohot roi

Puri raat wo nahi soi

Bimari ne use aisa jakad rakha tha

Aj to wo ishwar bhi ise dekh ro pada tha

Aj us maa ko mukti mil gai

Wo is sansar se chali gai

Subah bete ne maa ko uthaya

Par maa ne har roj ki tarah use gale nahi lagaya

Bete ne socha shayad maa der se soi hogi

Isiliye aj savere ankh nai khuli hogi

 

Beta fir maangne nikal pada

Maa k liye kabhi iske pair kabhi uske pair pada

Achanak se ek adami wahan ruka

Us bacche se uska pata pucha

Aur use sadak se utha uske ghar tak choda

Andar bistar par padi maa ka muh usne moda

Par maa nahi uthi, humesha ki tarah nahi hasi

Tab ek awaz bahar se ai “Beta tumhari maa ab nahi rahi”

Wo beta daud kar bahar gaya aur fir kabhi na aya

Apni maa ko is awastha me dekh use swaas nai aya

Dono maa bete wahi mitti ho gaye

Aur is sansaar me amar ho gaye

Aj usi ek kahani ka ehsaas fir hua

Isiliye mera mann itna udass hua

Dosto Amar wo hi nahi jisne koi mahan kaam kia

Wo bhi amar hai jisne apna Jeevan apni maa k naam kia.

 – Ria Sharma