मुझे मेरे घर है जाना

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मुझे मेरे घर है जाना

याद है मुझे वो कक्षा 5 का समय

जब दीवाली सबसे बड़ा त्योहार होता था

एक दो दिन का नहीं पूरे दस दिन का अवकाश होता था

ताईजी ताउजी, चाचा चाची सब एक घर मे इकहट्टा होते थे

सब साथ मिलकर घर की सफाई करते थे

इस सफाई मे कितनी खोई चीज़े मिलती थी

जिनके खोने की तारीख तक पता नहीं होती थी |

 

बाज़ार का सारा काम बाँट दिया जाता था

पापा पूरा पूजा का सामना लाते थे

ताउजी चाचा पटाखों की परख मे माहिर थे

धनतेरस पर सारे लड़के बैठ कर घर पे लाइट लगाते थे

और मैं और मेरी बहन बैठ कर कपड़ो का मैल बिठाते थे

 

दीवाली के पटाखे सबमे बराबर बाँटे जाते थे

हर बार मेरे ही पटाखे  बच जाते थे

और सबसे मज़ेदार बात

बचे पटाखे या तो नये साल के दिन काम आते थे

या फिर उनसे बंदर भगाए जाते थे

 

 

आँठ दस दिन घर का माहौल बदल जाता था

मिठाई खा खा कर सबका वजन एक दो किलो तो बढ़ ही जाता था

छुट्टियों के अंत मे भाई बहनो को छोड़ने ट्रेन पर पूरा परिवार जाता था

सच मे उस दिन बड़ा बुरा लगता था

क्योंकि अगले दिन से फिर से स्कूल जाना होता था

 

धीरे धीरे सबका आना बंद होता गया

हर कोई अपने काम मे व्यस्त होता गया

दीवाली का चाव भी फीका पड़ता गया

अब बस यह एक त्योहार रह गया

 

पर आज जब मैं खुद घर से इतना दूर हूँ

घर ना जाने के लिए मजबूर हूँ

तो पुराने दिनो की याद बहुत सताती है

चाचा की कॉफी और दादाजी की साइकल बहुत यात आती है

 

आज छुट्टी तो है पर कहीं घूमने नहीं जाना

मुझे बस मेरे अपनो से मिलने मेरे घर है जाना|

 

रिया शर्मा

 

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