आवाज़ उठी गोली चली

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आवाज़ उठी गोली चली

झूठ क्या है पता नहीं, पर नफ़रत सभी को है

सच की कीमत पता नहीं, पर सुनना सभी को है

बैठे बैठे जो मिल जाए उसी में खुश है

आवाज़ किसी को उठानी नहीं, पर बुराई से घिन सभी को है|

ग़लती ना तेरी है, ना कुसूर मेरा है

आवाज़ उठाने पर गोली चलाना, आजकल का दस्तूर ही ऐसा है

डर गया है कहीं हमारे अंदर का इंसान

दम-खम से जो लड़ता था आज हो गया गुमनाम |

है कुछ ऐसे अभी भी बाक़ी

जिन्होनें लगाई है अपनी जान की बाज़ी

हमे सच सुनाने को सच दिखलाने को

हमारी आँखों पर पड़ी चादर हटाने को |

पर कर दिया हर उस आवाज़ को शांत

जो किसी के खिलाफ उठी

सबसे आसान यहीं लगा

जहाँ आवाज़ उठी वहाँ गोली चली |

खुद की ग़लती स्वीकार नहीं

खुद की भद्दी शकल मंज़ूर नहीं

इसीलिए उस सच को ही झुटला दिया

शब्दो से नहीं, इस बार तो आग की लपटो से झुलसा दिया |

हिला दिया है इस बार हमारे अंतर मन को

उमीद है कुछ फरक तो पड़ा होगा आपको

याद रखना ये हमें डरा सकते है पर रोक सकते नहीं

ये हमे धमका सकते है, पर देश की आवाज़ को नहीं |

कितनो को गोली मरोगे, कितनो को सूली पर लटकाओगे

कितनो को जलती अग्नि मे झोकोगे, कितनो को सड़क के बीच मरोगे

इस बार सब मिलकर आवाज़ उठाते है

एक बार फिर आज़ादी की लड़ाई लड़ते है

इस दफ़ा गुलाम हम किसी  राजा के नहीं, खुद अपनी सोच के हैं

चलो आज हम इसे ही बदलते हैं |

अगर कोई ग़लत करेगा तो न्यायालय तक लेजाएँगे

अगर हम सहीं है तो अहिंसा से यह बतलाएँगे

हिंसा आसान है पर सहीं नहीं

हर परेशानी का हल ये “गोली” नहीं

समझ लो ये बात, यह समय फिर ना आएगा

कुछ दिनों बाद, संसार में हमारे-तुम्हारे जैसा कोई नज़र ना आएगा|

रिया शर्मा

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आज मुझे कहने दे

poemआज मुझे कहने दे

 

डोली दरवाजे पर सजी है

दुल्हन बनी बेटी सामने खड़ी है

यह मंज़र देख मेरी आँखें छलक पड़ी है

समझ नहीं आता यह जुदाई की या मिलन की घड़ी है|

 

सुन मेरी बेटी यह कहता हूँ तुझसे

प्यार अपार करता हूँ तुझसे

माना दिखाने मे थोड़ा कमज़ोर हूँ

पर सपने मे भी दूर हो सकता नहीं तुझसे|

 

पच्चीस साल से यह कभी कह ना सका

आज सोचता हूँ कह दूँ

बेटी मेरे जिगर का टुकड़ा हैं तू

कैसे तुझे मैं आज विदा कर दूँ|

 

झोली में झुलाया हैं कैसे तुझे डोली में बैठा दूँ

पलको पर रखा है कैसे किसी को सौप दूँ

कंधो पर खिलाया हैं अब कैसे कन्यादान दूँ

पिता हूँ मैं तेरा कैसे यह बलिदान दूँ|

 

माँ तेरी कहती थी बेटी का घर बसाना है

कैसे उसे बताऊँ यह मेरा सपना बरसो पुराना है

खुशियाँ तेरे कदम चूमे आसमान अपना शीश झुकाए

बस ख्वाइश है मेरी एक ऐसा आशियाना तुझे मिल जाए|

 

दौलत धन कितना होगा उस घर मे यह पता नहीं मुझे

मन का साफ़ एक फरिश्ता पर रहता होगा उस आँगन मे

एक ऐसा ही घर ढूँढा है मैनें तेरे लिए

क्या करू बेटी नहीं, साँसे है तू मेरे लिए|

 

मुस्कुरादे एक बार मेरी बच्ची हस कर विदा कर दूँगा

हीरे मोती से पता नहीं, खुशियों से झोली भर दूँगा

चाहत इतनी सी मैं दिल मैं रखता हूँ

बेटी एक बार सीने से लगा कर तुझे रोना चाहता हूँ|

 

मैं पिता हूँ इसीलिए अपना दर्द दिखा नहीं सकता

पर मेरी बच्ची आज मैं इसे छिपा भी नहीं सकता

जितनी बार तुझे डांटा है उतना गुना तुझसे प्यार करता हूँ

हर बार कहता नहीं, पर तेरा पिता होने पर मैं नाज़ करता हूँ|

 

रिया शर्मा

 

 

 

कल भी एक पल है

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कल भी एक पल है

कल को सँवारने मे मैं कल मे उलझी रही

बीते कल मे आने वाले पल को खोजती रही

शिकायत रब से यह हर बार करती रही

क्यूँ घड़ी की सुई मेरे हिसाब से चलती नहीं|

 

मैं वक़्त को हराने की कोशिश जी जान से करती रही

हर हार के बदले एक नया मौका माँगती रही

लड़ी उस अंत घड़ी तक

जब तक मेरी साँसे मुझे अलविदा ना कह चली|

 

दोस्‍तों,

कल के इतिहास मे नया सवेरा लिखा नहीं जाता

करी हुई ग़लती पर अफ़सोस जता कर कुछ हासिल किया नहीं जाता

अगर मन मे चाँद छूने की आस जगाए बैठे हो

तो बैठे बैठे तो आसमान मे छेद किया नहीं जाता|

 

किसी महापुरुष ने कहा था कि

कौन कहता है आसमान मे छेद करना नामुमकिन है

तू तबीयत से एक पत्थर उछाल कर तो देख

उसी प्रकार

कौन कहता है क़िस्मत का खेल सिर्फ़ उसके (खुदा के) हाथ में है

तू अपने मन मे अगले पल को जी कर तो देख

तू अपनी क़िस्मत खुद बना लेगा

वक़्त को छोड़ खुद पर भरोसा करके तो देख |

 

सफ़र यह तेरा आसान नहीं होगा

सौ बार इसमे गिरना फिर उठना होगा

पर नामुमकिन जैसे शब्द को अपनी सीढ़ी मत बना बैठना

वरना यह सफ़र तेरा कभी पूरा नहीं होगा |

 

अगर परिस्थिति बदल ना सके तो उसे स्वीकार करना सीख जा

अपनी सफलता की नींव अपने पसीने से सींच जा

याद रखना

वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं और किसी का एक जैसा रहता नहीं

वक़्त को छोड़ अभी तो तू खुद खुद को जानता नहीं

दूसरों को दोष देना बंद कर

अपनी ग़लतियों को सुधारना तू खुद चाहता नहीं

इसीलिए तुझे वक़्त चलाता है, तू खुद वक़्त को कभी चला पाता नहीं|

 

रिया शर्मा

 

 

 

 

 

 

मुझे मेरे घर है जाना

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मुझे मेरे घर है जाना

याद है मुझे वो कक्षा 5 का समय

जब दीवाली सबसे बड़ा त्योहार होता था

एक दो दिन का नहीं पूरे दस दिन का अवकाश होता था

ताईजी ताउजी, चाचा चाची सब एक घर मे इकहट्टा होते थे

सब साथ मिलकर घर की सफाई करते थे

इस सफाई मे कितनी खोई चीज़े मिलती थी

जिनके खोने की तारीख तक पता नहीं होती थी |

 

बाज़ार का सारा काम बाँट दिया जाता था

पापा पूरा पूजा का सामना लाते थे

ताउजी चाचा पटाखों की परख मे माहिर थे

धनतेरस पर सारे लड़के बैठ कर घर पे लाइट लगाते थे

और मैं और मेरी बहन बैठ कर कपड़ो का मैल बिठाते थे

 

दीवाली के पटाखे सबमे बराबर बाँटे जाते थे

हर बार मेरे ही पटाखे  बच जाते थे

और सबसे मज़ेदार बात

बचे पटाखे या तो नये साल के दिन काम आते थे

या फिर उनसे बंदर भगाए जाते थे

 

 

आँठ दस दिन घर का माहौल बदल जाता था

मिठाई खा खा कर सबका वजन एक दो किलो तो बढ़ ही जाता था

छुट्टियों के अंत मे भाई बहनो को छोड़ने ट्रेन पर पूरा परिवार जाता था

सच मे उस दिन बड़ा बुरा लगता था

क्योंकि अगले दिन से फिर से स्कूल जाना होता था

 

धीरे धीरे सबका आना बंद होता गया

हर कोई अपने काम मे व्यस्त होता गया

दीवाली का चाव भी फीका पड़ता गया

अब बस यह एक त्योहार रह गया

 

पर आज जब मैं खुद घर से इतना दूर हूँ

घर ना जाने के लिए मजबूर हूँ

तो पुराने दिनो की याद बहुत सताती है

चाचा की कॉफी और दादाजी की साइकल बहुत यात आती है

 

आज छुट्टी तो है पर कहीं घूमने नहीं जाना

मुझे बस मेरे अपनो से मिलने मेरे घर है जाना|

 

रिया शर्मा

 

शब्द

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शब्द

कैसे अपने मन को शब्दो मे बयान करुँ?

शब्द तो फिर भी कर दू उनके अर्थो को कैसे बयान करुँ?

क्योंकि इस दुनिया मे अर्थ का  ही तो अर्थ  है

शब्द तो वही है पर अर्थ हर वाक्य मे अलग हैं|

 

कभी एक शब्द किसी के चेहरे की हँसी बन जाता है

कभी वही शब्द किसी के आँखों की नमी का कारण बन जाता है

जो शब्दो के इस खेल को समझ गया

वो दुनिया के इस भंवर को जीत गया|

 

कोशिश करते रहना शब्दो से दिल जीत सको

वरना रिश्ते तो बिना बोले भी टूट जाते है

और इनके मुआवज़े उम्र भर के आँसुओ से भरे जाते है|

 

 यह शब्द ही है जो हमें एक दूसरे से जोड़े रखते है

वरना लोग तो जगह की दूरी से भी दिलो की दूरी बना सकते है|

 

पर याद रखना हर चीज़ के दो पहलू होते है

कभी अच्छाई तो कभी बुराई के प्रतीक होते है

अगर संभाल सको दोनो को एक साथ

तो याद रखना वर्णमाला मे वर्ण  नही मोती जड़े होते है|

 

रिया शर्मा

न्याय!!

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न्याय!!

यहाँ हर सच एक दरवाज़े में बंद है

इसलिए तो झूठ बिना सच के भी बुलंद है

सच को हर कटघरे में खड़ा किया जाता है

तारीख पर तारीख देकर उसे भी झूठ करार दिया जाता है

अंत तक संघर्ष करने के बाद भी

क्यूँ सच अनसुना रह जाता है?

 

बचपन से हमे सच कहना सिखाया है जाता

पर सच अपनाने का एक भी उदाहरण नहीं दिया जाता

मेरी नज़र मे सच कहना बड़ी बात नहीं है

सच सुनकर उसे अपनाना बड़ी बात है|

 

जब एक लड़की का शोषण हुआ तब न्यायालय ने सबूत माँगा

जब एक ग़रीब के साथ अन्याय हुआ तब भी न्यायालय ने सबूत माँगा

पर माँगा उससे जिसने यह सब सहा

ना की उससे जिसने यह सब करा

सोचो अगर आप खुद उस जगह होते तो सबूत इकट्ठा करते या खुद को बचाते

कुछ ऐसे ही सवाल मुझे और मेरे जैसे लाख़ों को हर रात है सताते|

 

यह नहीं कहूँगी की सच को न्याया नहीं मिलता

ना यह कहूँगी की सच को खुद को साबित करने का मौका नहीं मिलता

पर मेरा सवाल यह है कि

मौके और न्याय तक का यह फासला सच बोलने वाला ही क्यूँ तय करता है

क्यूँ सत्यमेव जयते का पलड़ा एक तरफ झुका रहता है.

 

रिया शर्मा

अनोखा एहसास

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अनोखा एहसास

जब तेरी नन्ही आँखों ने पहली बार मुझे देखा था
दुनिया की ना जाने किस खुशी का एहसास मेरे चेहरे पर झलका था

जब तेरे नन्हे हाथों ने पहली बार मेरे हाथ को पकड़ा था
उसी समय भरोसे से भरा एक वादा तुझसे किया था

जब पहली बार मुझे देख तू मुस्कुराया था
जो कह ना सकु उस खुशी का सैलाब आया था

वो दिन भी मुझे याद है जब तू मेरी ओर घुटनों के बल चला आया था
और खींच कर मेरे सर को अपनी गोदी मे रख सहलाया था

और जब भी तू मेरे पास बड़े सुकून से सोता था
उस लम्हे को वहीं रोक लेने का दिल करता था

आज भी तुझे गोदी मे खिलाने का, तेरे साथ घूमने जाने का दिल करता है
यह सिर्फ़ एक माँ का नहीं, एक मोसी का दिल भी यही कहता है.

तेरे साथ नहीं फिर भी हर रोज तुझे याद करती हूँ
तुझसे जल्दी मिलने की कोशिश दिन रात करती हूँ

तेरी हर ख़्वाहिश पूरी कर सकूँ इसीलिए यह दूरियाँ सहती हूँ
जिस दिन तू मुझे मोसी कहकर पुकारे उस दिन का इंतेज़ार बेसब्री से करती हूँ|

रिया शर्मा

मुखौटा

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मुखौटा

यहाँ हर सख़्श एक मुखौटा पहने घूम रहा है
एहेंकार के नशे मे बिना पिए झूम रहा है
दर दर भटकते ग़रीबों की कमाई पर आसमान छू रहा है
यहाँ हर सख़्श एक मुखौटा पहने घूम रहा है

कोई हस्ते हस्ते अपना गम बयान कर रहा हैं
कोई शराफ़त का चौला डाले शरीफों का खनन कर रहा है
कोई जात पात की आड़ मे अपनो का ही कत्ल कर रहा है
यहाँ हर सख़्श एक मुखौटा पहने घूम रहा है

अपने ही साथियो को अपने ही पैरों तले कुचल रहा है
ना जाने ये मनुष्य ऐसी कामयाबी पर कैसे इठलाए जा रहा है
कहीं ना कहीं हर इंसान अंधकार की झोली मे झुकता चला जा रहा है
यहाँ हर सख़्श एक मुखौटा पहने घूम रहा है|

रिया शर्मा

सच की आँधी

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सच की आँधी

 

सत्ता की तख्त पर बैठ बहुत लोगो ने अपना नारा तो सुना दिया

पर मेरे इन  सवालों का जवाब किसी ने नहीं दिया

 

शिक्षा का अधिकार तो सबने दे दिया

पर उसमे भी अमीर ग़रीब का फरक छोड़ दिया

 

क्यूँ हम ग़रीबो को सरकारी और अमीरो को निजी विद्यालय मिले?

जब भी मैने किसी निजी विद्यालय मे पढ़ना चाहा तो उसके द्वार हमेशा बंद मिले?

 

क्यूँ गाँव की क़लम से लिखे शब्द महेज गाँव तक ही रहते है?

क्या शेहेरि क़लम से लिखे शब्द सुनहरे होते है?

 

क्यूँ शिक्षा के चयन मे मेरी आर्थिक स्थिति महत्वपूर्ण है?

क्यूँ उसे नहीं चुना जाता जो उस कार्य के अनुसार परिपूर्ण है?

 

जब जब सरकारें बदली है तब तब वादों की धारा बही है

और हर बार की तरह अंत मे मेरे जैसो की आशाओं की अर्थी उठी है

 

हर कोई यह कह जाता है की हमने यह किया वो किया

अगर सच सुन सकते हो तो सुनो तुमने सिर्फ़ हमारे साथ धोखा किया

 

यहाँ सब दौलत की दौड़ मे लगे है

मगर भूल गये आज भी बहुत से लोग सड़क किनारे भूखे पड़े है

 

किस काम की वो शिक्षा जो हमे ख़ुदग़र्ज़ बना दे

महत्व तो उस शिक्षा का है जो हमे किसी और का शिक्षक बना दे

 

शिक्षा के नाम पर इमाराते खड़ी करना कोई महान काम नहीं

कोई अगर इस अमीर ग़रीब के अंतर को हटा दे तो उससे बढ़कर किसी का नाम नहीं

 

गुज़ारिश है मेरी आप सब से

इस कविता को पढ़ने वाले हर सक्श से

पहुँचा दो यह पैगाम उन नेताओ के महलों तक

जिन्हे यह भी नहीं पता की देश का भविष्य अभी भी रहा है भटक…..

 

रिया शर्मा

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नज़र नहीं नज़रिया चाहिए

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नज़र नहीं नज़रिया चाहिए

गुजर रही थी पड़ोस की गली से,

कुछ आवाज़ सी आ रही थी वर्मा जी की हवेली से

जाकर देखा तो उनकी बाई अपनी मालकिन से कुछ कह रही थी

अरे हाँ अगले महीने की पगार इसी महीने माँग रही थी|

 

जब मालकिन ने पूछा ऐसी क्या वजह आ पड़ी

तो वजह बताते बताते उसके चेहरे पर अंजानी सी खुशी झलक पड़ी

कहने लगी अपनी बेटी के घर जाऊंगी

अपनी नातीं को गोदी मे खिलाऊंगी

बस अगले महीने की पगार दे दो

मैं यह एहसान ता उम्र नहीं भूलाऊँगी

 

इतना सुनते ही मलिक वहाँ आ गये

उसकी बताई हुई वजह को कहानी बता गये

कहने लगे नहीं देना इसे पैसे अभी

हफ़्ते के अंत मे पिज़्ज़ा खाने चलेंगे  कहीं

 

फिर भी मालकिन ने उसे पैसे दे दिए

पैसा मिलते ही उसने मालकिन के पैर पकड़ लिए

बस एक ही बात की रट लगाई हुई थी

शुक्रिया कहने की गाथा उस बाई ने गाई हुई थी

 

कुछ दिन बाद…..

आज मैं फिर किसी बहाने वर्मा जी के घर आ गई

और मेरी नज़र उनकी बाई को ढूँढने मे लग गई

मैने देखा उनकी बाई आ चुकी थी

और सारे बर्तन भी धो चुकी थी

 

फिर मालकिन ने पूछा की क्या किया तूने उन पैसो का

अब देखिए शब्दो मे वर्णन पैसो के मोल का

चहेकते हुए बोली जो 1000 रूपई अपने दिए

वो मैने कुछ इस प्रकार खर्च कर दिए

 

200 रुपये से बेटी की साड़ी खरीदी

200 रुपये से जवाई जी की मिठाई की सामग्री खरीदी

40 रुपये की अपनी नाती के लिए टॉफी खरीदी

और 80 रुपयेकी टिकिट लेकर अपनी बेटी के घर पहुँची

 

मुझे देख मेरी बेटी खुशी से झूम उठी

मिठाई खाकर जवाई जी के चेहरे पे हसी की लहर दौड़ पड़ी

फिर एक दिन हम बाहर खाना खाने गये

वहाँ मैने 200 रुपये दिए

 

मेरी बेटी को मेरी दी हुई साड़ी बहुत पसंद आई

उसने तुरन्त उसे बनवाई और 2 दिन बाद वहीं  पहन कर मुझे विदाई देने आई

आते आते मैं 100 रुपये अपनी नाती  को दे आई

और फिर 80 रुपये का टिकेट खरीद वापस अपने घर को चली आई

 

मालकिन इन  रुपयों मे मैं ज़िंदगी जी आई

और यह 100 रुपये भी बचा लाई

यह देख मालकिन ने मलिक को बुलाया

और 900 रुपये का मतलब उन्हे भी समझाया

 

दोस्तो आज समझ आ गया

की जो 1000 रुपये हम सिर्फ़ पिज़्ज़ा खाने मे उड़ा देते है

वो ही 1000 किसी ज़रूरतमंद के लिए लाखो की खुशियाँ ला देते है

पैसे का असली महत्व आज समझ आया

एक बार फिर किसी किताब ने नहीं, किसी कीजीवनशैली ने मुझे यह सिखाया.

रिया शर्मा